मन की पवित्रता और समर्पण भक्ति का प्रथम सोपान: देवी कृष्णा प्रिया

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प्रतिनिधि

पलामू जिला मुख्यालय मेदिनीनगर के रेड़मा मथुराबाड़ी स्थित नवनिर्मित मंदिर में भगवान परशुराम की प्रतिमा का प्राण-प्रतिष्ठा अनुष्ठान विधिवत जारी है। इस अवसर पर 12 कुंडीय महायज्ञ तथा शिव महापुराण कथा सप्ताह का आयोजन किया गया है। कार्यक्रम के दौरान भगवान शिव के प्रिय भजन—“शिवजी बाघंबर वाले, भोला बाघंबर वाले”—के गायन से वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने गहरी आस्था और भक्ति भाव के साथ भजन-कीर्तन में सहभागिता की।

वृंदावन से पधारी कथावाचिका देवी कृष्णा प्रिया ने शिव महापुराण की कथा का रसपान कराते हुए भक्ति के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मन की पवित्रता, श्रद्धा और समर्पण ही भक्ति का मूल आधार है। जिनके हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति का भाव नहीं होता, उनका जीवन उद्देश्यहीन हो जाता है। मानव जीवन का वास्तविक आभूषण भक्ति है और इसकी सार्थकता इसी मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चलने में निहित है।

देवी कृष्णा प्रिया ने स्पष्ट किया कि ईश्वर की भक्ति अंधविश्वास या बाह्य आडंबर नहीं, बल्कि जीवन का मूल मंत्र है। ईश्वर बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि मन की सच्चाई और शुद्ध भाव से प्रसन्न होते हैं। माला-जप, भजन-कीर्तन और पूजा-पाठ जैसी क्रियाएं बाह्य हो सकती हैं, किंतु यदि भाव शुद्ध हों तो साधन की न्यूनता भी बाधक नहीं बनती। उन्होंने उदाहरण के माध्यम से बताया कि जैसे संतान प्रेमपूर्वक पिता को अर्पित करती है, उसी प्रकार मनुष्य जब ईश्वर को प्रेम भाव से अर्पण करता है, तो वही भाव ईश्वर को प्रिय होता है।

कथा के दौरान उन्होंने कहा कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म, अत्याचार व अन्याय बढ़ता है, तब भगवान शिव धर्म और भक्तों की रक्षा हेतु स्वयं प्रकट होते हैं। शिव की कृपा से ही समाज में पूजा-पाठ और मंदिरों से लोगों का जुड़ाव बना रहता है। उन्होंने भक्ति की शक्ति को समाज-परिवर्तन का माध्यम बताते हुए कहा कि भक्ति में अपार सामर्थ्य है, जो समाज और संसार की दिशा बदल सकती है।

देवी कृष्णा प्रिया ने सुख और आनंद के अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि सुख भौतिक और क्षणिक होता है, जबकि आनंद आध्यात्मिक और स्थायी। सुख बाहरी वस्तुओं और इच्छाओं से जुड़ा होता है, जो क्षणभंगुर है; जबकि ईश्वर से जुड़कर प्राप्त आनंद स्थायी होता है, जिसे धर्मशास्त्रों में परमानंद कहा गया है। उन्होंने कहा कि सुख बाहर खोजा जाता है, जबकि आनंद भीतर अनुभव किया जाता है। आत्म-साक्षात्कार और निष्काम भक्ति से ही परमानंद की अनुभूति संभव है।

उन्होंने निष्कर्षतः कहा कि मानव जीवन का परम उद्देश्य परमानंद की प्राप्ति है, जो शाश्वत है और ईश्वर-भक्ति से ही सुलभ होता है।

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